1. ग्वालियर कोर्ट के आदेश से मचा हड़कंप: पूर्व एएसपी समेत चार पुलिसकर्मियों पर डकैती, 30 लाख की वसूली और सीसीटीवी फुटेज डिलीट करने के आरोप
  2. ग्वालियर में कोर्ट के आदेश पर तत्कालीन एएसपी राजेश सिंह चंदेल समेत चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ डकैती, अवैध वसूली, धमकी और साक्ष्य मिटाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया। शिकायत में समझौते के नाम पर 30 लाख रुपये वसूलने का आरोप लगाया गया है।
  3. ग्वालियर कोर्ट के आदेश से मचा हड़कंप: पूर्व एएसपी समेत चार पुलिसकर्मियों पर डकैती, 30 लाख की वसूली और सीसीटीवी फुटेज डिलीट करने के आरोप
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ग्वालियर कोर्ट के आदेश से मचा हड़कंप: पूर्व एएसपी समेत चार पुलिसकर्मियों पर डकैती, 30 लाख की वसूली और सीसीटीवी फुटेज डिलीट करने के आरोप

ग्वालियर में कोर्ट के आदेश पर तत्कालीन एएसपी राजेश सिंह चंदेल समेत चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ डकैती, अवैध वसूली, धमकी और साक्ष्य मिटाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया। शिकायत में समझौते के नाम पर 30 लाख रुपये वसूलने का आरोप लगाया गया है।

t;ग्वालियर के पूर्व एएसपी सहित चार पुलिसकर्मियों पर डकैती और अवैध वसूली का मामला दर्ज<br /> ग्वालियर में पुलिस विभाग से जुड़ा एक गंभीर मामला सामने आया है। तत्कालीन एएसपी राजेश सिंह चंदेल, जो वर्तमान में डीआईजी भोपाल ग्रामीण के पद पर कार्यरत हैं, सहित चार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ डकैती, धमकी और जबरन वसूली जैसे आरोपों में प्रकरण दर्ज किया गया है। जिला न्यायालय के विशेष न्यायाधीश (डकैती) सुनील दंडोतिया ने परिवाद स्वीकार करते हुए 11 मई को इस संबंध में आदेश जारी किया।<br /> यह पूरा मामला घाटीगांव थाना क्षेत्र से जुड़ा है। शिकायत में तत्कालीन थाना प्रभारी सुरेंद्र नाथ यादव, एसआई अजय सिंह सिकरवार और साइबर आरक्षक संतोष वर्मा पर आरोप लगाए गए हैं कि उन्होंने थाने के अंदर ही फरियादी से बड़ी रकम वसूली, धमकाकर झूठे प्रकरण में फंसाने की चेतावनी दी और साक्ष्यों को प्रभावित करने की कोशिश की।<br /> परिवादी की ओर से अधिवक्ता अशोक प्रजापति ने न्यायालय को बताया कि धोखाधड़ी के एक मामले में समझौते के नाम पर पहले 5.80 लाख रुपये लिए गए। इसके बाद फरियादी को थाने बुलाकर लगभग 25 लाख रुपये की अतिरिक्त मांग की गई। जब शेष रकम नहीं दी गई, तो शिकायतकर्ता को ही षड्यंत्रपूर्वक आरोपी बनाकर जेल भेज दिया गया।<br /> अब अदालत के आदेश के बाद यह मामला पुलिस और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। यदि आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर सकता है।घाटीगांव थाना विवाद: समझौते के नाम पर 30 लाख रुपये वसूली और धमकी देने के आरोप<br /> फरियादी का कहना है कि उसने पुलिस अधिकारियों के खिलाफ वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत की थी, लेकिन लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद फरवरी 2024 में अदालत का दरवाजा खटखटाया गया। न्यायालय ने मामले को गंभीर मानते हुए लूट, डकैती, साक्ष्य मिटाने और आपराधिक षड्यंत्र जैसे आरोपों में प्रकरण दर्ज करने के आदेश दिए।<br /> समझौते के लिए जुटाए गए 30 लाख रुपये<br /> परिवादी अनुप राणा के अनुसार, उसके भाई विक्रम और चंद्रलेखा जैन के विरुद्ध घाटीगांव थाने में धोखाधड़ी का मामला दर्ज था। इस मामले को समाप्त कराने के नाम पर पुलिस अधिकारियों ने बड़ी रकम की मांग की। आरोप है कि उसने बैंक से ऋण लेकर और परिचितों से धन जुटाकर लगभग 30 लाख रुपये की व्यवस्था की।<br /> थाने में बुलाकर दी गई गंभीर धमकियां<br /> शिकायत के मुताबिक 24 दिसंबर 2023 को एसआई अजय सिंह सिकरवार ने अनुप राणा और उसके परिवार को थाने बुलाया। वहां कथित रूप से उन्हें डराया गया और कहा गया कि यदि मांगी गई राशि पूरी नहीं दी गई तो उन्हें फर्जी प्रकरण में फंसाकर जेल भेज दिया जाएगा। यहां तक कि मुठभेड़ में मारने जैसी धमकी देने का भी आरोप लगाया गया है।<br /> घर से मंगाई गई 24.75 लाख रुपये की राशि<br /> परिवादी ने आरोप लगाया कि साइबर आरक्षक संतोष वर्मा के माध्यम से उसके घर से 9 लाख 75 हजार रुपये मंगवाए गए। इसके अतिरिक्त चंद्रलेखा जैन से 15 लाख रुपये अलग से लिए गए। इस तरह कुल 24.75 लाख रुपये की वसूली किए जाने का दावा किया गया है।<br /> अदालत के आदेश के बाद बढ़ी हलचल<br /> मामले में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद पुलिस विभाग और प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है।5.80 लाख लेने के बाद भी बढ़ती रही रकम की मांग<br /> शिकायतकर्ता का आरोप है कि वह पहले ही एसआई अजय सिंह सिकरवार को 5 लाख 80 हजार रुपये दे चुका था। इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने अतिरिक्त रकम की मांग बंद नहीं की। आरोप के अनुसार तत्काल 6 लाख रुपये और दो दिन के भीतर 30 लाख रुपये और देने का दबाव बनाया गया। कहा गया कि यदि रकम नहीं दी गई तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।<br /> मांग पूरी न होने पर साजिश में फंसाकर भेजा जेल<br /> परिवादी के मुताबिक जब वह पूरी राशि देने में असमर्थ रहा, तो 18 जनवरी 2024 को उसे एक ऐसे आपराधिक मामले में सह-आरोपी बना दिया गया, जिसमें पहले उसका नाम शामिल नहीं था। इसके बाद उसे जेल भेज दिया गया। बाद में 8 फरवरी 2024 को उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद वह रिहा हो सका।<br /> वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी में होने का दावा<br /> शिकायत में कहा गया है कि इतनी बड़ी कथित वसूली स्थानीय थाना प्रभारी और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक की जानकारी के बिना संभव नहीं थी। इसी आधार पर संबंधित अधिकारियों पर आपराधिक षड्यंत्र की धारा के तहत भी आरोप लगाए गए हैं। फरियादी और उसके पिता ने इस संबंध में तत्कालीन एएसपी को लिखित शिकायत दी थी, लेकिन कथित रूप से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।<br /> जांच और कार्रवाई पर टिकी नजरें<br /> अब अदालत के आदेश के बाद पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग तेज हो गई है। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह मामला पुलिस तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।5.80 लाख लेने के बाद भी बढ़ती रही रकम की मांग<br /> शिकायतकर्ता का आरोप है कि वह पहले ही एसआई अजय सिंह सिकरवार को 5 लाख 80 हजार रुपये दे चुका था। इसके बावजूद पुलिसकर्मियों ने अतिरिक्त रकम की मांग बंद नहीं की। आरोप के अनुसार तत्काल 6 लाख रुपये और दो दिन के भीतर 30 लाख रुपये और देने का दबाव बनाया गया। कहा गया कि यदि रकम नहीं दी गई तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।<br /> मांग पूरी न होने पर साजिश में फंसाकर भेजा जेल<br /> परिवादी के मुताबिक जब वह पूरी राशि देने में असमर्थ रहा, तो 18 जनवरी 2024 को उसे एक ऐसे आपराधिक मामले में सह-आरोपी बना दिया गया, जिसमें पहले उसका नाम शामिल नहीं था। इसके बाद उसे जेल भेज दिया गया। बाद में 8 फरवरी 2024 को उच्च न्यायालय से जमानत मिलने के बाद वह रिहा हो सका।<br /> वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी में होने का दावा<br /> शिकायत में कहा गया है कि इतनी बड़ी कथित वसूली स्थानीय थाना प्रभारी और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक की जानकारी के बिना संभव नहीं थी। इसी आधार पर संबंधित अधिकारियों पर आपराधिक षड्यंत्र की धारा के तहत भी आरोप लगाए गए हैं। फरियादी और उसके पिता ने इस संबंध में तत्कालीन एएसपी को लिखित शिकायत दी थी, लेकिन कथित रूप से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।<br /> जांच और कार्रवाई पर टिकी नजरें<br /> अब अदालत के आदेश के बाद पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग तेज हो गई है। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह मामला पुलिस तंत्र की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।पैसों से भरे बैग के सबूत नहीं मिले, फुटेज पहले ही हटाए जा चुके थे<br /> परिवादी ने अदालत में बताया कि विक्रम और चंद्रलेखा जैन के घर से नकदी से भरा बैग साइबर आरक्षक संतोष वर्मा के माध्यम से घाटीगांव थाने पहुंचाया गया था। शिकायतकर्ता ने बैग का रंग और अन्य विवरण भी न्यायालय को बताए। इस कथित लेनदेन की पुष्टि के लिए सीसीटीवी फुटेज मांगे गए, लेकिन रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हो सके क्योंकि संबंधित वीडियो पहले ही डिलीट किए जा चुके थे। बाद में एडिशनल एसपी स्तर पर कराई गई तकनीकी जांच में भी फुटेज हटाए जाने की बात सामने आई।<br /> डकैती के मामले में अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं<br /> कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार डकैती जैसे गंभीर अपराधों में सामान्यतः सत्र न्यायालय से अग्रिम जमानत का लाभ नहीं मिलता। ऐसे मामलों में राहत के लिए आरोपियों को उच्च न्यायालय का रुख करना पड़ सकता है। इस वजह से संबंधित अधिकारियों के सामने गिरफ्तारी का जोखिम भी बना रह सकता है।<br /> हाईकोर्ट से मिल सकती है राहत<br /> मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के अनुसार, इस तरह के मामलों में अंतिम राहत न्यायालय के विवेक और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करती है। यदि आरोपी अग्रिम जमानत चाहते हैं, तो उन्हें हाईकोर्ट में याचिका दायर करनी होगी, जहां मामले के तथ्यों और आरोपों की गंभीरता के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।<br /> मामला बना चर्चा का केंद्र<br /> पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों सहित चार पुलिसकर्मियों पर डकैती और अवैध वसूली जैसे गंभीर आरोप लगने के बाद यह मामला व्यापक चर्चा में है। अदालत के आदेश के बाद अब सभी की नजरें जांच और आगामी कानूनी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।