ग्वालियर में 27 लाख के भ्रष्टाचार पर कोर्ट का बड़ा फैसला, PWD के तत्कालीन उपयंत्री को 5 साल की सजा, ₹1.02 लाख जुर्माना
ग्वालियर में 27 लाख रुपये के PWD भ्रष्टाचार मामले में कोर्ट का बड़ा फैसला। तत्कालीन उपयंत्री माधौ सिंह कुशवाह को 5 साल तक की सजा और ₹1.02 लाख जुर्माना।
Gwalior News: मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में करीब 26 साल पुराने भ्रष्टाचार के मामले में जिला न्यायालय ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। लोक निर्माण विभाग (PWD) के डबरा उपसंभाग में पदस्थ रहे तत्कालीन उपयंत्री माधौ सिंह कुशवाह को सरकारी निर्माण कार्यों में अनियमितता, फर्जी माप पुस्तिकाएं तैयार करने और शासन को लगभग 27 लाख रुपये की आर्थिक क्षति पहुंचाने के मामले में दोषी करार दिया गया है।
जिला न्यायालय के विशेष न्यायाधीश साबिर अहमद खान ने दोषी को विभिन्न धाराओं के तहत पांच साल तक के सश्रम कारावास और कुल 1 लाख 2 हजार रुपये के अर्थदंड से दंडित किया है।
क्या है ग्वालियर का 27 लाख रुपये का भ्रष्टाचार मामला?
यह मामला वित्तीय वर्ष 1999-2000 का है। उस समय लोक निर्माण विभाग के डबरा उपसंभाग में कई सड़कों के निर्माण, मरम्मत, मुरम डालने और गड्ढों की भराई के कार्य स्वीकृत किए गए थे।
इन निर्माण कार्यों में हरसी-भितरवार मार्ग, चितौली-रानीघाटी मार्ग, चीनौर-करेहिया मार्ग और मस्तूरा मार्ग सहित अन्य सड़कें शामिल थीं।
इन परियोजनाओं के लिए सरकारी धन स्वीकृत किया गया था। लेकिन जांच के दौरान निर्माण कार्यों के रिकॉर्ड और भुगतान प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।
बिना काम कराए तैयार की गईं फर्जी माप पुस्तिकाएं
मामले की जांच में सामने आया कि तत्कालीन उपयंत्री माधौ सिंह कुशवाह ने कथित तौर पर मौके पर वास्तविक निर्माण कार्य कराए बिना ही सरकारी दस्तावेजों में कार्य पूरा होना दर्शाया।
इसके लिए माप पुस्तिकाओं में फर्जी प्रविष्टियां दर्ज की गईं और उनके आधार पर बिल तैयार किए गए।
आरोप था कि इन बिलों को आगे स्वीकृति के लिए भेजकर ठेकेदारों को अनुचित भुगतान कराया गया।
इस प्रक्रिया से शासन को लगभग 27 लाख रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ।
विशेष न्यायालय ने सुनाई 5 साल की सजा
मामले की सुनवाई ग्वालियर जिला न्यायालय में हुई।
विशेष न्यायाधीश साबिर अहमद खान की अदालत में अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से तर्क प्रस्तुत किए गए।
अदालत ने गवाहों के बयान, उपलब्ध दस्तावेजों और अन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया।
साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने तत्कालीन उपयंत्री माधौ सिंह कुशवाह को दोषी पाया।
अदालत ने विभिन्न धाराओं के तहत पांच साल तक के सश्रम कारावास और कुल ₹1,02,000 के अर्थदंड की सजा सुनाई।
भ्रष्टाचार समाज के लिए गंभीर समस्या: कोर्ट
फैसले के दौरान न्यायालय ने सार्वजनिक पदों पर कार्यरत कर्मचारियों द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार को गंभीर समस्या बताया।
अदालत ने कहा कि लोक सेवकों के भ्रष्टाचार में शामिल होने से आम नागरिक प्रभावित होते हैं और सरकारी व्यवस्था के प्रति जनता का विश्वास कमजोर होता है।
न्यायालय ने इस प्रकार के मामलों में दोषियों को कठोर दंड दिए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
सरकारी सड़क निर्माण कार्यों में पारदर्शिता पर उठे सवाल
यह मामला सरकारी निर्माण परियोजनाओं में निगरानी और भुगतान प्रक्रिया की अहमियत को सामने लाता है।
सड़क निर्माण और मरम्मत जैसे कार्यों में माप पुस्तिकाएं महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड होती हैं। इनमें किए गए कार्य की मात्रा और अन्य तकनीकी विवरण दर्ज किए जाते हैं।
यदि इन रिकॉर्ड में गलत जानकारी दर्ज की जाती है, तो वास्तविक कार्य की पुष्टि किए बिना सरकारी धन का भुगतान होने का जोखिम बढ़ जाता है।
ग्वालियर का यह मामला इसी तरह की अनियमितताओं से जुड़ा था।
26 साल पुराने मामले में आया फैसला
वित्तीय वर्ष 1999-2000 से जुड़े इस मामले में नवंबर 2026 में न्यायालय का फैसला सामने आया है।
यह फैसला सरकारी धन के दुरुपयोग और निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों में जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करता है।
Digital Gwalior News पर पढ़ते रहिए ग्वालियर, डबरा और मध्य प्रदेश की प्रमुख खबरें।
नोट: यह समाचार 3 नवंबर 2026 को प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट के उपलब्ध विवरण पर आधारित है। न्यायालय के मूल आदेश का स्वतंत्र सत्यापन नहीं किया गया है।