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ग्वालियर की गोशाला में हुई अनोखी डेस्टिनेशन वेडिंग: पर्यावरण संरक्षण का संदेश

– शहर के लालटीपारा स्थित गोशाला में बुधवार को एक अनोखी और यादगार डेस्टिनेशन वेडिंग का आयोजन हुआ। छतरपुर की अंजली और ग्वालियर के अंशुमन ने प्राचीन परंपराओं और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ अपनी शादी को खास बना दिया। यह शादी न केवल संस्कृति के प्रति प्रेम को दर्शाती है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा भी देती है।

अनोखी बारात और स्वागत शादी की शुरुआत अंशुमन की बारात से हुई, जो बैलगाड़ी पर सवार होकर गोशाला पहुंची। बारात का यह पारंपरिक स्वरूप सभी के लिए आकर्षण का केंद्र बना। बारातियों और मेहमानों के लिए गोशाला प्रांगण में घास के सोफे लगाए गए थे, जो पूरी तरह से प्राकृतिक सामग्री से बनाए गए थे।

मंडप और सजावट शादी का मंडप प्राचीन भारतीय संस्कृति को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया था। गोशाला प्रांगण की लिपाई-पुताई गोबर से की गई, जिससे स्थान को पारंपरिक और स्वच्छ माहौल मिला। फूलों और पत्तों से सजी सजावट ने इस शादी को और अधिक खास बना दिया।

दान में सब्जियां: नई परंपरा की शुरुआत शादी में एक अनोखी पहल करते हुए वर-वधु ने दहेज की प्रथा को ठुकरा दिया और इसके स्थान पर गोशाला को टमाटर, गोभी, गाजर और अन्य सब्जियों का दान दिया। इस कदम का उद्देश्य समाज में दहेज जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ जागरूकता फैलाना और जरूरतमंदों की सहायता करना था।

संस्कृति और पर्यावरण का संगम अंजली और अंशुमन की शादी न केवल पारंपरिक भारतीय संस्कृति को उजागर करती है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देती है। शादी में प्लास्टिक या कृत्रिम सामग्रियों का बिल्कुल उपयोग नहीं किया गया। मेहमानों के लिए मिट्टी के कुल्हड़ों में पेयजल और पत्तलों में भोजन परोसा गया।

लोगों में उत्साह इस अनोखी शादी ने स्थानीय निवासियों और मेहमानों के बीच उत्साह भर दिया। सभी ने इस पहल की सराहना की और इसे अन्य शादियों के लिए एक मिसाल बताया।

एक प्रेरणादायक उदाहरण अंजली और अंशुमन की यह अनोखी शादी न केवल ग्वालियर बल्कि पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। यह शादी दर्शाती है कि परंपराओं और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाकर भी यादगार समारोह आयोजित किया जा सकता है।